An attempt to speak the truth..

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Sunday, January 24, 2010

निसर्ग

                                 निसर्ग

निसर्ग म्हणजे घन वनराई निसर्ग म्हणजे शांत निळाई
दाहकतेतून पान्थस्ताला निसर्ग अलगद स्वप्नी नेई

तलम धुक्यतुन एक सरिता निखळपणाने गीते गाई
वळणे घेऊन अवखळतेने मार्ग काढूनी पुढती जाई

कधी स्तब्धतो निसर्ग चंचल कधी बहरतो परी जादुई
कधी अवतरे तो रिमझीम तर कधी अचानक बरसुन जाई

निसर्ग असतो वसंत, शिशिर निसार्गभसतो यमन, मारवा
कधी ताळापतो उन्हासारखा कधी पसरतो गोड गारवा

इंद्रधनूच्या रांग रूपाने आजोड आकृती बनवून जाई
अवघी सृष्टी निसर्गाच्या कलाकारीने चकीत होई

कितीक रूपे कितीक व्याख्या अपुरी वाटे शब्दकमाई
तुझे दान ओंजळीत पडले ..असेल कदाचित आमाचीच पुण्याई!

                                                                              -- ओंकार खरे


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